टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के दो छात्रों को मुंबई की एक सत्र अदालत ने इसलिए अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया कि उन्होंने प्रोफ़ेसर जी एन साईबाबा की पुण्यतिथि के अवसर पर एक जमावड़े में कथित रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई के नारे लगाए थे और उनके पास माओवादी विचारधारा वाली किताबें/सामग्री थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि छात्रों को देश के कानून का सम्मान करना चाहिए।
अक्तूबर 2025 में हुए इस कार्यक्रम में कथित रूप से हिस्सा लेने वाले 7 अन्य छात्रों को अदालत ने अग्रिम जमानत दे दी।
अदालत ने कहा कि साईबाबा, जिन्हें उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले बरी किया गया था, को श्रद्धांजलि देना गैरकानूनी नहीं है, यह आरोप कि उक्त दो छात्रों ने उमर और शरजील के समर्थन में नारे लगाए थे और उनके इलेक्ट्रिक डिवाइस से जो सामग्री मिली थी, उन्हें अग्रिम जमानत देने के विरुद्ध जाता है।
उमर और शरजील 2020 से कथित दिल्ली दंगा षडयंत्र मामले में यूएपीए के तहत हिरासत में हैं।
इंस्टीट्यूट में साईबाबा की पुण्यतिथि के अवसर पर कार्यक्रम के आयोजन को लेकर पुलिस ने छात्रों के खिलाफ धार्मिक, जातिगत या सामुदायिक समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने, राष्ट्रीय अखंडता के विरुद्ध बयानबाजी करने और गैरकानूनी जमावड़े के आरोपों के तहत मामला दर्ज किया था। छात्रों ने इन आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि इन गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीबी बोहरा ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रोफेसर को उनके खिलाफ लगे आरोपों से बरी कर दिया गया था और इसलिए उन्हें श्रद्धांजलि देना गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। लेकिन आरोपियों की गतिविधि श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं थी, उन्होंने उमर खालिद और शरजील इमाम की जेल से रिहाई के नारे भी लगाए जो यूएपीए के तहत यानी राष्ट्र के विरुद्ध गतिविधियों को लेकर मुकदमे का सामना कर रहे हैं।
न्यायाधीश ने कहा, “दूसरे शब्दों में, ऐसे नारे किसी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन या रैली में नहीं लगे। सुप्रीम कोर्ट उमर और शरजील की जमानत अर्जी खारिज कर चुकी है। छात्रों के रूप में उनसे अपेक्षा की जाती है कि देश के कानून का सम्मान करें।”
उक्त दोनों छात्रों ने नारे लगाने या भाषण देने से इंकार किया और कहा कि सोशल मीडिया में फैलाये “झूठे नैरेटिव” के कारण उन पर यह आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने अपनी अर्जी में कहा कि संस्थान के प्रबंधन ने दावा किया था कि छात्रों ने प्रबंधन को बताया था कि ऐसे नारे लगे थे। इन आरोपों के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है।
प्रबंधन की ट्राम्बे पुलिस को दी शिकायत के अनुसार 12 अक्तूबर 2025 की शाम साढ़े सात से साढ़े आठ बजे के बीच प्रोफेसर को श्रद्धांजलि देने के लिए दस से बारह छात्र देवनार कैंपस में बिना अनुमति के जमा हुए।
विशेष सरकारी वकील शिशिर हीरे ने अग्रिम जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि साईबाबा प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के सक्रिय सदस्य थे और उन्हें बरी किये जाने के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित है।
अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि दो छात्रों के लैपटॉप और फोन से आपत्तिजनक सामग्री मिली है। इसमें सेलेक्टिव वर्क्स ऑफ माओ, लेनिन की द राइट ऑफ नेशंस टू सेल्फ डिटरमिनेशन, एन रवि की कास्ट एंड रिवोल्यूशन, कोबार्ड घांडी की फ्रैक्चर्ड फ्रीडम और सीपीआई (माओवादी) के प्रकाशन शामिल हैं।
बचाव पक्ष के वकील विजय हीरेमठ ने कहा कि छात्र कैंपस में एक चाय की टपरी के पास प्रोफेसर साईबाबा के जेल में दस वर्षों के कारावास को लेकर और “विकलांगता अधिकारों” के समर्थन में जमा हुए थे और वहां पढ़ी गई कविताओं में शांति, समानता और सद्भाव की बात थी। प्रबंधन से अनुमति इसलिए नहीं ली गई थी कि यह एक स्वत:स्फूर्त छोटा जमावड़ा था कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं। इसलिए इसे गैरकानूनी जमावड़ा नहीं कह सकते।
बचाव वकील ने कहा कि डाउनलोड की गई किताबें माओवादी विचारधारा से जुड़ाव साबित नहीं करतीं और खुले आम खरीदने के लिए उपलब्ध हैं।
अदालत ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी माओवादी संगठन की प्रकाशित किताबें डाउनलोड करना अपराध नहीं माना जाएगा लेकिन किताबें, भले सरकार ने प्रतिबंधित न की हों, लेकिन कथित रूप से भारत को बांटने को भड़काती या मदद करती हैं…
अदालत ने यह भी कहा कि यह दर्शाता है कि वह कथित रूप से माओवादी विचारधारा से प्रेरित थे और जमावड़ा अन्य छात्रों पर भी लागू करने के उद्देश्य से था।
अदालत ने कहा, “…भले छात्रों ने कोई अपराधिक कृत्य नहीं किया पर यह कार्य और मिली सामग्री उनके बर्ताव को लेकर संदेह पैदा करती है।
जनवरी में इस मामले में पिछले न्यायाधीश, जिन्होंने तबादले से पूर्व आंशिक सुनवाई की थी, ने छात्रों को फटकार लगाई थी और चेतावनी दी कि उनके खिलाफ मामले का प्रभाव भविष्य में उनके नौकरी पाने की संभावनाओं पर पड़ सकता है।
(जनचौक ब्यूरो)